
निर्जला एकादशी से क्यों मिलता है पूरे साल की एकादशी व्रत का फल
पद्म पुराण के अनुसार, एक बार पांचों पांडवों में से भीमसेन ने वेद व्यासजी से पूछा कि मैंने एक भी व्रत नहीं किया है क्योंकि मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है। जिसके कारण मुझे सदैव भूख महसूस होती है। ऐसे में मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो केवल एक बार करने से मेरा भी उद्धार हो सके और मुझे स्वर्ग लोक की प्राप्ति हो। तब व्यासजी ने भीमसेन को ज्येष्ठ मास में पड़ने वाली एकादशी को निर्जल रहकर व्रत करने को कहा। एक ऐसा महीना जो अधिक गर्म होता उसमें निर्जल रहना अत्यंत कठिन है। इसीलिए इस एकादशी के व्रत को अत्यंत कठिन माना जाता है। व्यासजी ने बताया केवल इस एक एकादशी के व्रत को करने से वर्ष भर में पड़ने वाली सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो जाता है।
अक्षय फल होता है प्राप्त
अगर कोई मनुष्य साल भर में पड़ने वाली एकादशियों का व्रत करने में असमर्थ हो, वह ज्येष्ठ मास की निर्जला एकादशी का व्रत कर सकता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए पुण्य कार्य अक्षय हो जाते हैं। इस व्रत को स्वयं भीमसेन किया था, तभी इसे भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
निर्जला एकादशी को विधि-विधान से उपवास और पूजा करके द्वादशी के दिन व्रत का पारण करना चाहिए।


