धार्मिक महत्व
पौष पुत्रदा एकादशी संतान सुख और पारिवारिक समृद्धि की प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
इस दिन व्रत करने से साधक के पाप नष्ट होते हैं, जीवन में शांति, सुख-समृद्धि और सकारात्मक बदलाव आते हैं।
जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति नहीं हुई है, उनके लिए व्रत विशेष रूप से लाभकारी है।
भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से मनोकामनाओं की पूर्ति और घर में सुख-शांति बढ़ती है
पौष पुत्रदा एकादशी पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे संतान सुख, पुत्र प्राप्ति, विवाह सुख और परिवार का कल्याण सुनिश्चित होता है। यह व्रत केवल संतान सुख तक सीमित नहीं, बल्कि परिवार में सुख-शांति, ऐश्वर्य और सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से, यह एकादशी कृतज्ञता, संयम और भक्ति को बढ़ाने का अवसर है। व्रत करने वाले व्यक्ति का मन और हृदय पवित्र होते हैं, जिससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और नैतिक बल का संचार होता है।

पौष पुत्रदा एकादशी के विशेष उपाय
संतान सुख की कामना: दंपति व्रत के समय विशेष रूप से संतान प्राप्ति के लिए मंत्र और पूजा विधान का पालन कर सकते हैं।
सूर्योदय में अर्चन: सूर्योदय के समय भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को अक्षत, पुष्प और फल अर्पित करना शुभ फल देता है।
सामाजिक और मानसिक साधना: व्रत करते समय संयम, पवित्र विचार और धार्मिक आचार का पालन अत्यंत आवश्यक है।
व्रत नियमितता: यदि व्रत श्रद्धापूर्वक और नियमपूर्वक किया जाए तो लाभ दोगुना माना जाता है।
फल और लाभ
पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत करने से:
परिवार में संतान सुख और पुत्र प्राप्ति का वरदान मिलता है।
घर में शांति, समृद्धि और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है।
भक्त का आध्यात्मिक और नैतिक बल मजबूत होता है।
दान और भक्ति से सकारात्मक ऊर्जा और समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है।
इस प्रकार, दिल से श्रद्धा और भक्ति के साथ पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत और पूजा करने पर संतान सुख, परिवार कल्याण और जीवन में समृद्धि सुनिश्चित होती है।


