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श्रावण पुत्रदा एकादशी 5 अगस्त 2025: व्रत कथा, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त – संतान प्राप्ति का वरदान

श्रावण पुत्रदा एकादशी हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र मानी जाती है। यह दिन विशेष रूप से उन दंपतियों के लिए शुभ होता है जो संतान की कामना रखते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु का व्रत रखने और पूजा करने से संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। यह एकादशी श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की होती है और इस वर्ष यह मंगलवार, 5 अगस्त 2025 को मनाई जाएगी।

  • व्रत तिथि एवं शुभ मुहूर्त (5 अगस्त 2025):
  1. एकादशी तिथि प्रारंभ: 4 अगस्त 2025 को शाम 4:15 बजे
  2. एकादशी तिथि समाप्त: 5 अगस्त 2025 को शाम 6:02 बजे
  3. पारण (व्रत खोलने) का समय: 6 अगस्त को प्रातः 6:00 बजे से पूर्वाह्न 8:30 बजे तक
  4. पारण के लिए द्वादशी समाप्ति: सुबह 10:42 बजे तक
  • पूजा विधि:
  1. प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें।
  2. घर या मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्नान कराएं और पीले वस्त्र पहनाएं।
  3. तुलसी पत्र, पीले पुष्प, पंचामृत और फल अर्पित करें।
  4. विष्णु सहस्रनाम या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
  5. दिनभर व्रत रखें – निर्जला व्रत का अधिक पुण्य है, परन्तु स्वास्थ्य अनुसार फलाहार ले सकते हैं।
  6. रात्रि को जागरण करें और भगवान विष्णु की आरती करें।
  7. अगले दिन द्वादशी को ब्राह्मणों को भोजन कराएं और व्रत का पारण करें।
  • व्रत कथा:

प्राचीन काल में महिष्मति नामक नगरी पर महिष्मान नामक राजा शासन करते थे। राजा धर्मपरायण, प्रजा के प्रति न्यायप्रिय और परम भक्त थे, लेकिन एक ही चिंता उन्हें हर समय व्यथित करती थी, उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं था। राजा और रानी ने अनेक यज्ञ, दान और तीर्थ यात्राएँ कीं, फिर भी उन्हें संतान प्राप्त नहीं हुई। वर्षों बीत गए, राजा धीरे-धीरे चिंता और मानसिक पीड़ा में डूबते चले गए। वे सोचने लगे कि यदि उनके बाद कोई उत्तराधिकारी नहीं रहा, तो राज्य का भविष्य क्या होगा?

एक दिन राजा दुखी मन से वन की ओर निकल पड़े और वहीं एक तालाब के किनारे ध्यानमग्न हो गए। कई दिनों तक उन्होंने कुछ नहीं खाया, बस प्रभु से यही प्रार्थना करते रहे कि उन्हें संतान प्राप्त हो। उसी समय वहां देवर्षि नारद प्रकट हुए। उन्होंने राजा से उनके दुःख का कारण पूछा। जब राजा ने अपनी व्यथा सुनाई, तो नारद मुनि ने कहा –

“राजन! तुमने पूर्व जन्म में कुछ ऐसे कर्म किए थे जिनके फलस्वरूप इस जन्म में संतान नहीं हो रही। लेकिन चिंता मत करो, मैं तुम्हें एक ऐसा व्रत बताता हूँ जिसे करने से तुम्हारी संतान की इच्छा पूर्ण हो सकती है।”

नारद मुनि ने राजा को श्रावण शुक्ल एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करने की सलाह दी और भगवान विष्णु की पूजा करने का तरीका बताया। राजा महिष्मान ने पूर्ण श्रद्धा और नियम से इस व्रत का पालन किया।

व्रत समाप्ति के बाद कुछ ही समय में रानी ने गर्भधारण किया और समय आने पर एक सुशील, बलवान एवं तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। उस बालक ने आगे चलकर अपने पिता की तरह ही धर्मपूर्वक राज्य संभाला और प्रजा को सुखी रखा। इस प्रकार श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत के प्रभाव से राजा को संतान सुख प्राप्त हुआ। तभी से यह व्रत विशेष रूप से संतान की प्राप्ति और संतान की लंबी आयु के लिए किया जाने लगा।

  • श्रावण पुत्रदा एकादशी का महत्व:
  1. संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपतियों के लिए वरदानस्वरूप।
  2. जीवन में सुख-शांति, संतान की दीर्घायु और समृद्धि के लिए लाभकारी।
  3. पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग।

श्रावण पुत्रदा एकादशी केवल संतान की कामना के लिए ही नहीं, बल्कि भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का एक अद्भुत अवसर है। इस दिन सच्चे मन से व्रत एवं पूजा करने पर जीवन की कई बाधाएं दूर होती हैं।

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